आज शाम जब बिटिया सब्जी लेने जाने लगी तो कहा ‘पापा!कुछ बढ़ाकर पैसे देना,सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं’।रूटीन में उसे 500/-दे देता था क्योंकि एटीएम से अमूमन पाॅच सौ वाले नोट ही निकलते हैं।अतःउसकी बात ध्यान में रखकर,उसे 600/रु.दे दिये।उसके साथ नातिन और कार्मिक लड़की भी चली गई।मैं अकेले में सोचने लगा तो एक पुराना वाकया याद आ गया।
1957/58 था।मैं कानपुर में बुआ के घर पर रहकर डी ए वी कालेज से ग्रैजुएशन कर रहा था।गाॅव विशुनपुर में घर था।पिता जी का स्वर्गवास हो चुका था।अम्मा और दद्दा किसी तरह पढ़ाई चला रहे थे।फीस माफ रहती थी।कालेज के हेड क्लर्क पं.विद्याधर,जिनकी हैसियत प्रिंसिपल के बाद नम्बर दो पर थी,फूफा के मित्र थे।वे हमारी फीस माफी के पैरोकार रहते थे।इस बार किसी काण से फीस नहीं माफ हुई,तो चिन्तित हुवा।एक दो दिन ही बीते थे कि क्लास में आफिस का चपरासी आया।श्री नानकसरन निगम इकनामिक्स पढ़ा रहे थे।चपरासी ने एक पर्ची निगम साहब को दी।पढ़कर निगम साहब बोले’Raghottam!U are called by Pt.Vidyadhar.”मैं आफिस गया।पण्डित जी ने मुझे 400/रु देकर कहा ‘तुम्हें यह Book Grant’मिली है।
मैं खुशी खुशी पैसे लेकर चला आया।
रविवार को गाॅव गया।फीस न माफ होने वाली खबर बताई तो अम्मा उदास और दद्दा चिन्तित हो गये।मैंने तत्काल दूसरी खबर बताई।दोनों के चेहरे चमक उठे।दद्दा बोले ‘तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।मैं इन पैसों से भैंस लाता हूॅ।उसक दूध दुदहा को देकर फीस का इन्तज़ाम कर दूॅगा’।वे अगली बाज़ार भैंस ले आये।उस समय 300/की साधारण भैंस आती धी।यदि कोई 400/-वाली भैंस लाये तै गाॅव स्तर की खबर बन जाती थी;और 500/-वाली भैंस लाने पर आसपास के कई गाॅवों में Bteaking News बनती थी।
दद्दा 400/रु वाली लाए थे।सो गाॅव के लोग आने लगे।कुछ के मन में प्रश्न उठा कि अचानक इतना पैसा कहाॅ से आया?कुछ ने औपचारिक तारीफ की।ईर्ष्यालुवों की दो श्रेणियाॅ थीं।कुछ तो देखकर चुपचाप चले गये।कुछ से नहीं रहा गया।बोले “मोटे चाम की है;दूध कम देगी”।
मैं यहाॅ उसके दूध देने और लोगों की प्रतिक्रियावों की विवेचना नहीं करूॅगा,क्योंकि सम्प्रति यह हमारा वर्ण्य विषय नहीं है।
मैं यह कह गया कि तब 400/ की भैंस,अब 600/-की सब्जी।
——रघोत्तम शुक्ल


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