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अयोध्या: पुरानी मूर्ति का क्या हुआ

सम्पादक -शारदा शुक्ला

भगवान की सगुणोपासना में मूर्ति पूजा का एक विशेष स्थान है।मूर्ति एतत्सम्बन्धी देवता का श्रीविग्रह माना जाता है,जिस पर श्रद्धा पूर्वक अक्षत भी अर्पित कर देने पर वह जीवन्त किंवा प्राण प्रतिष्ठित हो जाता है,क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि में भाव या श्रद्धा ही मुख्य कारक होते हैं।कहा गया ‘श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई।बिनु महि गंध कि पावहि कोई’।अन्यतम दर्शन ग्रंथ गीता अध्याय 9 श्लोक-26 में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है,कि ‘पत्र पुष्प,फल या जल,जो भी मुझे भक्ति पूर्वक समर्पित करता है,उसे मैं सप्रीति सगुण रूप से ग्रहण करता हूॅ।ऐसे में प्राण प्रतिष्ठा जैसे कई दिन चलने वाले किसी कर्मकाण्ड की अनिवार्यता नहीं होती है।

हालाॅकि यदि साधन और समय है,तो इसे करने में कोई हर्ज भी नहीं है।ऐसे में धर्म शास्त्रों में वर्णित नियमों का पालन आवश्यक होता है।सम्प्रति अयोध्या में बनें राम मंदिर में श्रीराम की नवीन मूर्ति का मुद्दा ज्वलंत है।22 जनवरी को 84 सेकेण्ड के अति अल्प कालीन मुहूर्त में प्रधानमंत्री के मुख्य यजमानत्व में इसे सम्पन्न किया।इस प्रकरण पर कुछ प्रश्न भी ज्वलंत हैं,जिनके सटीक उत्तर नहीं मिल पा रहे हैं।इन सवालों के जवाब कधित भक्तों द्वारा प्रश्नकर्तावों पर कटु और तीक्ष्ण वाग्वाण छोड़कर दिये जा रहे हैं,जो सभ्य समाज द्वारा स्वीकार किये जाने योग्य नहीं हैं।लोकतंत्र में विमति के स्वर दबाये और बलात् कुचले जाने की पद्धति स्वस्थ नहीं मानी जा सकती।इस प्राण प्रतिष्ठा हेतु एक नई मूर्ति लाई गई है,जबकि पुरानी मूर्ति सकुशल मौजूद है।अब गर्भ गृह में नई को मुख्य मूर्ति बनाया जायगा और पुरानी किनारे करके गौण कर दी जायगी।यह पुरानी अनेकशः पूजित मूर्ति की स्पष्ट अवमानना है,जो बहुतों को अखरेगी।अब उनकी न सुनी जाय तो बात और है।निर्वाणी अखाड़े ने इसके विरुद्ध संघर्ष का ऐलान किया है।मंदिर अभी अधूरा है और अधूरे भवन में स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा का क्या औचित्य है?ऐसी क्या जल्दी है?मंदिर पर शिखर नहीं है,जिसके अभाव में गर्भ गृह की ऊपरी छत पर निर्माण कर रहे मिस्त्री मजदूर पद चारण करेंगे।इस समय वृहस्पति पर शनि की दृष्टि होने से देवगुरु विकल हैं,जो 1 मई को प्रदूषण मुक्त होंगे।शुभ कार्यों में उनका दीप्त और प्रखर होना जरूरी होता है।उस समय तक का इंतजार करने में क्या दिक्कत है।पूस का महीना भी शुभ नहीं माना जाता है।आदित्य पुराण के अनुसार यह दूसरा पितृ पक्ष तुल्य होता है,जिसमें पितरों और सूर्य की अर्चना ही करणीय होती है।84 सेकेण्ड में प्राण प्रतिष्ठा का शास्त्रोल्लिखित विधान असम्भव है।यजमान भवन स्वामी ही हो सकता है,जो महाराज दशरथ के वंशज ही हो सकते हैं।यदि वे न मिल सकें तो धर्माचार्य ब्राह्मण कर सकते हैं।शास्त्र विधान तो यही कहता है।मंदिर सरकार का तो है नहीं कि यह सरकार के मुखिया से कराया जाय।चौथे वर्ण को धर्म ग्रंथ यह अधिकार नहीं देते हैं।श्रीराम ने तपरत शम्बूक का वध किया था,जो चौथे वर्ण का था और अपना नियत सेवाकर्म छोड़ तपस्या कर रहा था।सांविधानिक पदों पर बैठे लोग सेकुलर राज्य में किसी एक धर्म या पंथ विशेष के नायक कैसे बन सकते हैं?

इन सवालों का समाधान है तो आवश्यक,लेकिन इनका उपहास करके तिरस्कृत कर दिया जाय,तो यह शक्तिशाली का दम्भ ही होगा।यदि वे राम को मानते हैं,तो उन्होंने तो एक कार्यार्थी कुते की भी बात ध्यानपूर्वक सुनी थी और न्याय दिया था।

रघोत्तम शुक्ल

स्तंभकार

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