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अजब-गजब किस्से लखनऊ के नवाबों के

सम्पादक – सुश्री शारदा शुक्ला

नवाब सन दस और उनके बेटे की दास्तान
सन 1910 में अंग्रेज़ों ने लखनऊ के एक नवाब की बहुत बड़ी जायदाद का अधिग्रहण किया और इस के बदले उनको कई करोड़ रुपए अदा किए।अचानक इतनी बड़ी रक़म मिलने से नवाब घबरा गए और ये सोच सोच कर परेशान हो गए कि अंग्रेज़ों ने जो काग़ज़ के नोट उनको दिए हैं उनका क्या-किया जाये। अपनी इस परेशानी का ईलाज उन्होंने यूँ निकाला कि नोट जला कर चाय बनाना शुरू की,फिर नोटों की सिगरेट बना कर खूब उसके कश लगाए, नोट तब भी ख़त्म नहीं हुए तो पतंग में सौ रुपय का नोट बांध कर पतंग उड़ाने लगे। उनकी पतंग बाज़ी की वजह से शहर का वह हाल हुआ कि उनकी कटी पतंग जिधर जिधर जाती थी उस के पीछे एक भीड़ दौड़ती थी। पतंग पाने के लिए लोग एक दूसरे से मारपीट भी करने लगते थे।आख़िर कार साल भर के अंदर ही अपने सारे नोट ख़त्म करके उन्होंने फ़ुर्सत पाई। चूँकि उन्होंने नोट ख़त्म करने का ये तरीक़ा 1910 में अपनाया था इसी कारण से उनको नवाब सन दस कहा जाने लगा। उनकी शोहरत का आलम यह हो गया कि अगर कोई आदमी फुज़ूलखर्ची करता तो लोग ताना देते हुए कहते बड़े नवाब सन दस बन रहे हो। दिलचस्प बात यह कि उनके कुछ क़रीबी अज़ीज़ों को छोड़कर उनका असली नाम कोई नहीं जानता था। पूरा शहर उनको नवाब सन दस ही कहता था । मुझे भी उनका नाम मालूम नहीं था, लेकिन पिछले दिनों लखनऊ के इमाम बाड़ा गुफ़रां मॉब में एक क़ब्र का पत्थर देखकर मैं हैरान रह गया। वो क़ब्र नवाब सन दस के बेटे की थी और क़ब्र पर भी बड़े गर्व से मरहूम नवाब को नवाब सन दस कह कर याद किया गया था।मुझे पहली बार मालूम हुआ कि नवाब सन दस का असली नाम नवाब ख़ादिम हुसैन ख़ां था और वह मुफ़्ती गंज में रहते थे।वह क़ब्र के बेटे की थी जिनका नाम नवाब अली था और जिनका निधन ग्यारह जुलाई 1978 को हुआ था।


नवाब अली का मैंने देखा था। वो बज़ाज़े की लांड्री हसन ब्रदर्स में कपड़ों पर प्रेस कर के अपने परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम करते थे ।बचपन में ही मुझे किसी ने बताया था कि वो नवाब सन दस के बेटे थे।सब अली नवाब को नवाब साहिब ही कह कर बुलाते थे।
मैंने उनका एक कमाल और देखा था। इतवार को नख़्ख़ास में जो बाज़ार लगती थी उस में बहुत से तमाशा दिखाने वाले आया करते थे। मैं बचपन में पाबंदी से यह तमाशे देखने पहुंच जाया करता था। एक-बार वहां एक सपेरा साँपों का तमाशा दिखा रहा था तो नवाब साहिब ने उस को चैलेंज किया कि अगर वह मिटटी पर एक दायरा (कुंडल) खींच देंगे तो साँप इस दायरे से बाहर नहीं निकल सकेगा। सपेरे ने कहा बहुत पहुंचे हुए लगते हो, मुक़ाबला करोगे? नवाब साहिब ने फ़ौरन हाँ कर दी और सपेरे से कहा पहले वो वार करे। सपेरे ने खेल शुरू किया तो बीन की धुन के साथ साथ नवाब पर वो छोटी छोटी कंकरियां मारने लगा। कुछ देर में नवाब ज़मीन पर गिर गए और बार-बार अपने गाल पर हाथ मारने लगे।कुछ देर बाद सपेरे ने नवाब साहिब को एक बूटी सुँघाई और नवाब नॉर्मल हो कर खड़े हो गए। इस के बाद उन्होंने सपेरे से कहा कि अब वह वार करेंगे। सपेरे ने हामी भरी तो नवाब ने कहा कि वह बीन बजाता रहे। सपेरा बीन बजा रहा था और नवाब कुछ पढ़ पढ़ कर सपेरे पर कंकरियां मार रहे थे। जब सात कंकरियां नवाब अली ने मार दीं तो सपेरा बौखलाया से मजमा में कूदने लगा उसकी पगड़ी गिर गई और बीन से अजीब अजीब सी आवाज़ निकलने लगी जब वह गिरने लगा तो नवाब ने इस को सँभाला और कुछ पढ़ कर उस की बीन पर हाथ मारा सपेरे की बीन नीचे गिर गई और सपेरा नॉर्मल हो गया। सपेरे ने दौड़ कर नवाब के पैर पकड़े और बोला शाह साहब तुमने तो मेरी जान ही ले ली थी मेरी बीन में गले में फंसा दी थी।
इस पूरे तमाशे का नतीजा ये हुआ कि सपेरे की आमदनी ख़ूब हो गई मगर नवाब अली ने कोई पैसा इस से नहीं लिया और फिर से सड़क पार करके लांडरी में जा कर प्रैस लगे। इस तमाशे को देखने वाले कुछ लोग तो हैरान थे और कुछ इस को सपेरे और नवाब अली की मिली भगत बता रहे थे। सच जो भी था मैं नहीं जानता मगर नवाब अली की क़ब्र पर उनके बाप का नाम और साथ ही साथ नवाब सन दस लिखा देखकर लगा कि भले ही नवाब अली ग़रीबी में मरे हूँ लेकिन उनकी फ़ैमिली के लोगों को ये लगा कि उनका परिचय केवल नवाब ख़ादिम अली ख़ां जैसे गुमनाम नवाब के नाम से ही नहीं बल्कि नवाब सन दस के पुत्र नाम से भी किया जाये हालंकि अगर नवाब ख़ादिम हुसैन खां ने अपनी दौलत को सोने चांदी में बदल लिया होता तो उनके बेटे को लोगों के कपड़े प्रेस करने न पड़ते बल्कि वो भी घर से निकलते तो प्रेस की हुई महंगी शेरवानी पहन कर निकलते।

शकील हसन शम्सी

वरिष्ठ पत्रकार

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