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लक्ष्मी के साथ गणेश क्यों?

दीपावली का महापर्व उपस्थित है।इसमें गणेश और लक्ष्मी की पूजा का विधान है।अब प्रश्न यह उठता है कि देवी देवतावों के अपने युग्म हैं और सामान्यतया वे अपने युगल रूप में ही अर्चनीय होते हैं,जैसे शिव-पार्वती,लक्ष्मी-नारायण,सीता-राम इत्यादि।मंदिरों में भी इसी रूप में ये युग्म प्रतिष्ठित होते हैं।ऐसे में लक्ष्मी जी का जोड़ा तो भगवान विष्णु के साथ है और गणेश जी की पत्नियाॅ ऋद्धि और सिद्धि हैं;फिर दीपावली में यह अनोखा युग्म क्यों?आइये प्राचीन ग्रंथ खॅगालते हैं।ब्रह्मवैवर्त पुराण के ‘गणपति’खण्ड के अनुसार श्रीकृष्ण ही गणेश जी के रूप में अवतरित हुए है और कृष्ण ही विष्णु हैं।कहा गया है “कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्”।एक बार पार्वती जी ने महादेव जी से प्रार्थना की कि उन्हें सर्वगुण सम्पन्न पुत्र की अभिलाषा है।इसपर शिव जी ने उन्हें एक वर्ष तक ‘पुण्यक व्रत’रखने की सलाह दी,जिससे श्रीकृष्ण प्रसन्न होंगे और मनोकामना पूरी करेंगे।पार्वती जी ने ऐसा ही किया।व्रत पूर्ण होने पर कृष्ण जी ने उन्हें दर्शन दिये और वरदान माॅगने को कहा।माता पार्वती ने उनसे उनके समान ही पुत्र माॅगा,तो कृष्ण जी ने स्वयं ही उनके पुत्र रूप में आना स्वीकार कर लिया और अंतर्धान हो गये।इसके पश्चात् वे अयोनिज होकर,पुत्र रूप में उनके ऑगन में पालने पर खेलने लगे।यही गणेश जी थे।इस तरह गणेश स्वयं कृष्ण यानी विप्णु हैं।श्रीमद्भागवत् पुराण की कथानुसार एक बार भगवान विप्णु ने पार्वती जी की गोद में कार्तिकेय को खेलते देखा तो उन्हें लालच आ गया कि ‘काश!मैं भी इनका पुत्र होता तो ऐसे ही क्रीड़ा करता और इन माता का अमृत-दुग्ध पान करता’।जगज्जननी पार्वती ने उनका मनोभाव जान लिया और मनोकामना पूरी होने का वरदान दे दिया।वही गणेश रूप में जनमें।एक अन्य कथा के अनुसार एक बार लक्ष्मी जी को अपने रूप सौंदर्य एवं सर्व ग्राह्यता पर अहंकार हो गया और इसे विष्णु भगवान से प्रकट कर दिया।भगवान गर्व प्रहारी हैं।उन्होंने उनका अभिभान चूर्ण करने के लिये कह दिया कि ‘तुममें एक बहुत बड़ी कमी है कि ‘संतानवती नहीं हो’।इस पर वे आहत हुईं और अपनी सखी पार्वती जी के पास जाकर दुखड़ा रोया।पार्वती जी के दो पुत्र थे;अतः उन्होंने अपने पुत्र गणेश को उन्हें गोद दे दिया और कहा कि ‘तुम्हारे साथ इनकी पूजा होगी’। इस प्रकार गणेश जी लक्ष्मी जी के दत्तक पुत्र हुए।
धर्म वृत्तांत तर्क से परे होते हैं।’हरि अनंत हरि कथा अनंता’और ‘सोइ जानइ जेहि देउ जनाई’की उक्तियाॅ तो प्रसिद्ध ही हैं।
इन पौराणिक आधारों पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी पूज्य हैं और इस युगल की अर्चना से शुद्ध बुद्धि,सिद्धि और धर्मसंगत विपुल धन सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।

——रघोत्तम शुक्ल

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