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भाजपाई नारी वंदन नारों तक!

सम्पादक -शारदा शुक्ला

अभी चंद मास पूर्व केंद्र में सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023’पारित किया था।यह सर्व सम्मत पास हुवा।इस संविधान संशोधन के द्वारा लोकसभा व विधानसभावों में 33%प्रतिशत आरक्षण महिलावों को दिया गया।हालाॅकि ऐसे व्यावहारिक पेंच फॅसाये गये कि इसका कार्य रूप में परिणत होना 2029 से पहले सम्भव न हो पायेगा।हो भी पायेगा या नहीं;इस पर धुॅधलका बरकरार है,क्योकि तबतक पता नहीं ऊॅट किस करवट बैठे?बस सत्तारूढ़ दल ने यह इरादा जता दिया कि वह महिलावों का हितैषी है।इस तरह महिला वोट बैंक साधने का प्रयास किया गया।अब सद्यःसम्पन्न हुए प्रादेशिक चुनावों में तीन जगह-मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान-में उसे बहुमत मिला।महिला वर्ग ने बढ़ चढ़कर समर्थन भी किया;किंतु जब सरकार गठन की बारी आई,तो एक भी जगह महिला को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया।तीनों जगह हाई कमान द्वारा तय किये गये नाम मुख्यमंत्री के रूप में घोषित कर दिये गये।वहाॅ के स्थानीय कद्दावर नेतावों के अंतर्विरोध को दरकिनार किया गया।कम से कम राजस्थान में तो वसुंधरा राजे सिंधिया के रूप में एक नारी चेहरा यह पद सम्हालने के बखूबी योग्य था।चुनावी सभावों में केंद्र के दो भारी भरकम नेता-राजनाथसिंह और नितिन गडकरी-उनके पूर्व मुख्यमंत्रित्व काल के कार्यों की जमकर प्रशंसा भी करते रहे थे।अगर उन्हें इस पद पर आरूढ़ कर दिया जाता,तो लगता कि भाजपा वास्तव में नारी शक्ति वंदन में रुचि रखती है और इस वर्ग की प्रगति व सशक्तिकरण के लिये गम्भीर है।ध्यान देने योग्य है कि अन्य भाजपा शासित प्राॅतों में भी कहीं नारी पदासीन नहीं की गई।वसुंधरा की तो ऊपर की पीढ़ी भी भाजपा और जनसंघ के प्रति निष्ठावान रही है।स्व.विजया राजे सिंधिया को कौन नहीं जानता!भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रार्थना में भी कहा गया है–

होवें दुधारू गौवें पशु अश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही।।

लेकिन यह कैसे होगा;जब काफी ऊॅचाई तक बढ़ चुकी नारी को हटाकर एक अल्प ज्ञात पुरुष चेहरा प्रतिस्थापित कर दिया जायगा।भाजपा तो सनातन धर्म की झण्डाबरदार है और प्राचीन आर्य संस्कृति की अनुसरक व समर्थक है।हमारे यहाॅ तो नारियाॅ वेद मंत्रों की द्रष्टा भी रहीं है और युद्ध करने वाली वीरांगनाएं भी।वैदिक नारी ‘विष्कला’युद्ध में गई थी और उसमें घायल हुई थी।महाराणी लक्ष्मीबाई और कर्मावती को तो सब कोई जानता है।पुराने समय में तो नारियों की सैन्य टुकड़ियाॅ भी होती थीं।राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने “सिद्धराज”खण्ड काव्य में ‘वामा व्यूह’का जिक्र किया है-

स्वप्न नहीं सत्य किंतु गत वे दिवस हैं।
वामाव्यूह आज हमें जान पड़े सपना।
देश था स्वतंत्र और राजा था अपना।।

अच्छा हो नारियों की प्रतिभा और क्षमता का सही मूल्यांकन करते हुए उन्हें पदासीन किया जाय।केवल कागज़ी सशक्तिकरण निरर्थक है।

रघोत्तम शुक्ल
स्तंभकार

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1 comment

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